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Sunday, November 27, 2016

सर्वोच्च व उच्च न्यायालय द्वारा जारी की जाने वाली रिट और उनकी प्रकृति

भारतीय संविधान द्वारा सर्वोच्च न्यायालय को मूल अधिकारों का संरक्षक बनाया गया है। सर्वोच्च न्यायालय व उच्च न्यायालय मौलिक अधिकारों को लागू करने के लिए सरकार को आदेश और निर्देश दे सकते हैं। न्यायालय कई प्रकार के विशेष आदेश जारी करते हैं जिन्हें प्रादेश या रिट कहते हैं और जिनका उद्देश्य मूल अधिकारों का संरक्षण करना होता है। कुछ प्रमुख रिटों व उनकी प्रकृति का उल्लेख निम्नवत् हैं-
(i) बंदी प्रत्यक्षीकरण- यह एक लैटिन शब्दावली है जिसका अर्थ है ‘निरुद्ध व्यक्ति को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करो।’ इस रिट के द्वारा न्यायालय किसी गिरफ्तार व्यक्ति को न्यायालय के सामने प्रस्तुत करने का आदेश देता है, विरुद्ध करने के कारणों को बताने को कहता है और यदि गिरफ्तारी का तरीका या कारण गैरकानूनी या असंतोषजनक हो, तो न्यायालय गिरफ्तार व्यक्ति को छोड़ने का आदेश दे सकता है।
इस प्रकार इस रिट का मुख्य उद्देश्य अवैध रूप से निरुद्ध किये गये व्यक्ति को शीघ्र उपचार प्रदान करना है। सुनील बात्रा बनाम दिल्ली प्रशासन (1980) के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया है कि इस रिट का प्रयोग गिरफ्तार व्यक्ति को केवल गिरफ्तारी से मुक्त कराने के लिए नहीं वरन् जेल में उसके विरुद्ध किये गये अमानवीय और क्रूर बर्तावों से संरक्षण प्रदान करने के लिए भी किया जायेगा। इस रिट की मांग निरुद्ध व्यक्ति की ओर से कोई अन्य व्यक्ति भी कर सकता है।
(ii) परमादेश- परमादेश का शाब्दिक अर्थ है, ‘हम आदेश देते हैं’। इस रिट द्वारा लोक अधिकारी को उसके ऊपर विधि द्वारा आरोपित कर्तव्य के पालन के लिए बाध्य किया जाता है। दूसरे शब्दों में यह आदेश तब जारी किया जाता है जब न्यायालय को लगता है कि कोई सार्वजनिक पदाधिकारी अपने कानूनी और संवैधानिक दायित्वों का पालन नहीं कर रहा है और इससे किसी व्यक्ति का मौलिक अधिकार प्रभावित हो रहा है।
परमादेश रिट निम्नलिखित परिस्थितियों में जारी नहीं किया जा सकता-
यदि संबंधित अधिकारी का कर्तव्य केवल उसके विवेकीय या व्यक्तिगत निर्णय पर आधारित हो तो परमादेश रिट नहीं जारी किया जायेगा।
निजी व्यक्तियों या निजी संस्थाओं के विरुद्ध परमादेश रिट जारी नहीं किया जा सकता, क्योंकि उन पर कोई लोक कर्तव्य आरोपित नहीं किया जा सकता है।
परमादेश रिट व्यक्तियों के बीच संविदात्मक कर्तव्यों के पालन के लिए नहीं जारी किया जा सकता।
(iii) प्रतिषेध- जब कोई अधीनस्थ न्यायालय या अधिकरण अपने अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण करके मुकदमे की सुनवाई करती हैं या प्राकृतिक न्याय के नियमों के विरुद्ध कार्य करती हैं तो उनके खिलाफ प्रतिषेध रिट जारी किया जाता है। इस रिट का मुख्य उद्देश्य अधीनस्थ न्यायालयों के द्वारा की गई न्यायिक त्रुटियों को ठीक करना है। इस रिट के जरिये वरिष्ठ न्यायालय अधीनस्थ न्यायालय को उन कार्यवाहियों को आगे बढ़ाने से रोकता है जो उसकी अधिकारिता में नहीं है। प्रतिषेध रिट केवल न्यायिक और अर्ध-न्यायिक संस्थाओं के विरुद्ध जारी किया जाता है। यह कार्यपालिका या प्रशासनिक प्राधिकारियों के विरुद्ध जारी नहीं किया जाता है और न ही विधायिका के विरुद्ध।
(iv) उत्प्रेषण- उत्प्रेषण रिट द्वारा अधीनस्थ न्यायालयों या न्यायिक अथवा अर्द्ध न्यायिक कार्य करने वाले निकायों में चलने वाले वादों को वरिष्ठ न्यायालयों के पास भेजने का आदेश दिया जाता है जिससे उनके निर्णय की जाँच हो सके और यदि वे दोषपूर्ण हों तो उन्हें रद्द किया जा सके। उच्चतम एवं उच्च न्यायालय अपने अधीनस्थ न्यायालय या अर्ध-न्यायिक निकायों के निर्णयों के विरुद्ध निम्नांकित आधार पर उत्प्रेषण रिट जारी कर सकता है-
* अधिकारिता का अभाव अथवा अधिक्य।
* नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन।
* निर्णय में वैधानिक गलती।
प्रतिषेध व उत्प्रेषण में अंतर
जब कोई अधीनस्थ न्यायालय ऐसे मामले की सुनवाई करता है जिस पर उसे अधिकारिता प्राप्त नहीं है तो वरिष्ठ न्यायालय प्रतिषेध रिट जारी करके अधीनस्थ न्यायालय को उन कार्यवाहियों को आगे बढ़ाने से रोक सकती है, दूसरी ओर यदि अधीनस्थ न्यायालय मुकदमे की सुनवाई कर चुका है और निर्णय दे चुका है तो उत्प्रेषण रिट जारी किया जायेगा और उक्त कार्यवाहियों को रद्द कर दिया जायेगा। संक्षेप में प्रतिषेध रिट एक कार्यवाही के मध्य में जारी होता है, जिससे उस कार्यवाही को रोका जा सके और उत्प्रेषण रिट की कार्यवाही की समाप्ति पर अंतिम निर्णय के विरुद्ध निर्णय को रद्द करने के लिए जारी किया जाता है।
(v) अधिकार पृच्छा- अधिकार पृच्छा का शाब्दिक अर्थ है- "आपका प्राधिकार क्या है"? यह रिट किसी ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध जारी किया जाता है जो किसी सार्वजनिक पद को अवैध रूप से धारण किये हुये है। इस रिट द्वारा उससे यह पूछा जाता है कि वह किस प्राधिकार से वह पद धारण किये है। इसका मुख्य उद्देश्य किसी व्यक्ति को उस पद के धारण करने से रोकना है जिसे धारण करने का कोई वैध अधिकार नहीं प्राप्त है। यदि जाँच करने पर यह पता चलता है कि उसको धारण करने का कोई अधिकार नहीं था तो न्यायालय अधिकार पृच्छा रिट जारी करके उस व्यक्ति को पद से हटा देगा और उस पद को रिक्त घोषित कर देगा।

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